हिंदी मे सटिक विश्लेषण ... डॉ एच जी जोषी.

                              वादे करने और कहने में क्या हर्ज है...?



                                                                  *सामान्य अवलोकन*                     

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प को हर समय निशाना बनाया जाता है, बलि का बकरा बनाया जाता है! 

कई अन्य EU, UK, फ्रांस, कनाडा, जर्मनी, वगैरह ने भारत के खिलाफ पक्षपातपूर्ण रुख अपनाया है, कइ बार

अगर साथ नहीं दिया तो और दिया तो भी!

हमारी "वसुधैव कुटुंबकम" की फिलॉसफी को सिर्फ़ अवास्तविक और एक कल्पना माना गया!


ग्रीनलैंड का मुद्दा लें। USA के नज़रिए को भी देखें!

पहले, जो देश तटस्थता बनाए रखते थे, उन्होंने हमेशा PAK के पक्षमें प्राकृतिक घटनाओं को गलत समझा। भारत को मजबूर किया गया, दबाया गया, प्रतिबंध लगाए गए और सज़ा दी गई। 

पाक को गलत तरीके से फायदा पहुँचाया गया, अंजानेमे ही सही मगर डिप्लोमसी मे इतनी बडी गलत फहमी नहि चल शकती ....अपने देश के वर्गोंको खुश करने के लिए, मामूली गलतियों से ज़्यादा। हर बार हमे बातचीतमे तारीफ कर करके शांति दूत जैसी लुभावनी बाते सजा कर टालते रहे...

हमारे पिछले नेताओं ने भी व्यक्तिगत गौरव, स्वार्थ के नाम पर और देश को नज़रअंदाज़ करके गलत फैसले लिए। उन्हें दिखावटी इनाम और खेल मिले, लेकिन यह *भ्रष्टाचार* का नहीं, बल्कि सैन्य नज़रिए से परे जाने का नतीजा हो सकता है। 

दूरदर्शिता, निर्यात/आयात और ज़रूरी चीज़ों को प्राथमिकता नहीं दी गई, कम से कम भी नहीं। सभी मुद्दों में शोषण को कुछ चैरिटी, 'अच्छा महसूस कराने वाली' लेकिन दिखावटी चीज़ों में छिपाया गया। 

पश्चिम की अच्छी किताबों में रहने के लिए, उनकी स्वाभाविक प्रवृत्तियों को चालाकी से इस्तेमाल किया गया! कोई भी भारतीय कूटनीतिक काम देखें, इनसे बहोत कुछ मिलता है... दिपक वोरा किसी भी तकरीर देख इलिजीए वो एक दुर दर्शन से ही फोरेन अफेर्स पढ कर आइ एफ एस जोइन की... और राजदूत कइ देशोमे इस विचित्र दोगले पन से वाकिफ है... और अब निस्चित है , रीटायर्ड है तो सारी बाते सलिके से बता रहे है...

बच्चा बड़ा हो गया है और पटाना बंद हो गया है,..

जर्नल माणेक शा की कनहानीया बताते है... राजकीय लाभ के बाद 93 हजार युध्ध कैदी पाकीस्तान को यु ही अपने कुछ सो बन्दे भी छुडवामे विलम्ब आ जाती है... और सच्ची बहोत देर कर दी महेरबान आते  आते...और किसी छोटी सी प्रोटोकोल खामीया निकालते हुए  जर्नल को पेंशन ले ने भी बहोत दिक्कते सरकार खजाने , और मंत्रालयने बाधाए डाली...  सिंगापोर मे नेताजी सुभाश चंद्र बोज़ को वहाके लोगो ने पूतला बनाया ... वहा हमारे मंत्रीओ ने विजिट तक नहि की क्यु के "ब्रिटिश नाराज़ हो जाए तो"  और क इ एसे क्रांतीवीरो को जैसे भगत सिन्ह वगैरह को फांसी से उम्र .कैद करवा शकते थे नहि की. और टेकनीकल कारण जताते हुए इंटर्पीटेशन किया ... तो वीर सावरकर जैसे देशभक्त्को अंग्रेज से विनंती करने वाला या माफी मांगनेवाला  लालचु इंसान जतानेकी कोशिष की... ये तो भला हो महाराष्ट्र के उन वीरो का जीन्होने ये कत इ स्विकार नहि कीया....  क्या फर्क पडता है आज कल कहेते हुए  लेफ़्ट ब्लोक और क इ चापलूस राज्यकर्मीओ ने    डायरेक्ट ब्रिटिश नफरत कम   करके अपने आदमीओ को ही खराब जतानेकी चेष्टा की.

लोग अब हल्के में लिए जाने को तैयार नहीं हैं! मीडिया की तरक्की ने इसे घर-घर तक, बेहतर कहें तो मोबाइल-टू-मोबाइल तक उजागर कर दिया है :-)।

लोग दोबारा जांच करते हैं और ज़्यादा स्मार्ट हो गए हैं। ज़्यादा भरोसा नहीं करते। 

BBC और CNN, प्रमुख प्रेस, फिल्म डॉक्यूमेंट्री मीडिया पूर्वाग्रहों से भरा है....वे बेनकाब हो गए हैं, 

और उनके लालच के बीच अविश्वास अब खुला है। उनके चालाक भाषण उन्हें और बेनकाब करते हैं क्योंकि 

'युद्ध में पक्षों का समर्थन' और अपने हितों की रक्षा करना सामने आ रहा है। 

स्पष्ट सबूत। देखा और महसूस किया गया। सतर्क आबादी अब वास्तविकता का बेहतर आकलन कर रही है,

 इतिहास उनके हितों को बहुत स्पष्ट रूप से दिखाता है, 

वे सभी विदेशी चले गए लेकिन सत्ता के निशान छोड़ गए और हमेशा शिक्षा में रिश्वत, जाति-धर्म, गरीब-अमीर के मुद्दों को ज़िंदा रखा! 

वे आज़ादी की वकालत करते हुए देश छोड़ रहे हैं, लेकिन उनकी नाकामियों को रेलवे, बनाए गए संस्थानों

 (ईमानदारी से कहें तो यह अन्यथा महंगा भी है😇), और ये सब चीझे उखाडके ले जाना वास्तवीक नहि उल्टा ज्यादा खर्च लगता... इस लिये भारत मे सब छोड गये.... और इसको योगदान तरककी  जताके हमे दबावमे रखा...... जैसे बुनियादी ढांचे से ढका गया है..

. शशि थरूर का धन्यवाद, 

जिन्होंने पश्चिमी लोगों के प्रॉपर्टी पैरामीटर को कम करने के लिए पश्चिम को बेनकाब किया, 

जो गलत तरीके से स्टैटिस्टिक्स में हेरफेर कर रहे थे।

 उन्होंने 1901 से 1947 तक, पश्चिमी प्रतिष्ठित एजेंसियों द्वारा किए गए अध्ययनों का हवाला दिया! 

यह अनुपात दुनिया के नक्शे पर खराब शासन को दिखाता है, 

जिसमें यूके, युद्ध करने वाले देश, भारत, और 1947 के बाद पाकिस्तान भी शामिल था। समजलो ये सब छीपाने वाले कितने बदतर इंसान थे.... जो काबू मे थे.... और सरकार उनको बडे बडे अध्यक्स, ट्रीप, विजिट पोस्टींग मे मोके पर चोके मारके लुभाती रही... 

सर चर्चिल ने बंगाल में अकाल में मदद नहीं की, हालांकि बंगाल की खाड़ी में शीपमेंट मे बहोत अतिरिक्त चावल था। अकाल के दौरान सक्रिय रूप से कुछ ब्रिटिश कैंपों में चावल फेंकने का आदेश दिया गया, इसे दूर दूर ब्रिटिश सोल्जर के लिये है कहेते हुए  डायवर्ट किया....  और काफी मात्रामे अनाज सडभी गया... समंदरमे फेंका... लेकिन गरीब, मरते हुए बंगालियों की उपेक्षा की गई। कोई भी बंगाली इसे भूलने को तैयार नहीं है।

 निराशा और अवसरों से भरे देश में एक स्ट्रेटेजिक ढूंढना, सौदेबाजी करना.... पश्चिम चालाक, साधन संपन्न और अपने देशों के प्रति ईमानदारभी है! सो विदेशी संगठन बडी सफलता से इन कमजोरीओ का फायदा ले शका...

बटेंगे तो कटेंगे हमेशा बटेंगे तो हारेंगे होता है!

हमारी अपनी पौराणिक कथा रामायण में विभीषण है!!?? कूटफूट के लिए अंदर से हो तो सफल रहता है...

तो आम लोगों के लिए, ऐसा होता है चाहे कुछ लोग इसे पसंद करें या नहीं! ईमानदारी की खरीद-फरोख्त में पश्चिम कामयाब है..

लोग विकसित होते रहेते है... क इ किताबो पर पाबंदी ... निगरानी ... गलत शेरींग की वजह से और अंध विश्वास के हम शांती   शांती करते रहे और  पाक और चीन अपने साथ गुस्ताखी करते रहे....  स्थानिक  अपनाही हित देख ते रहे..उनको  खेलने के मौके दे दीया.... . 

वे दिन गए जब गोरी त्वचा ही सब कुछ थी, 

यहां तक ​​कि औसत दर्जे के लोगों को भी बेहतर माना जाता था! एक बेंचमार्क सेट किया गया!  ब्रेड्मेन औस्ट्रेलियन , जैसे अन्य बडे इंगलीश खिलाडी कुछ भी बहाना करके  क्रिकेट खेलनेभी भारत नहि आते थे... बडे नाम कोइ  न कोइ बहाना बता कर भारतको  साप मदारी जादुगर के देश जैसी छवि उजागर की थी....   ये स्विकार करो...

सही हो या गलत, रूस और चीन ने अपने दम पर हर कोइ की ख्वाहिश के विरुध्ध खूदको  महाशक्ति बनाया है।

आज फिरभी  भारत चौथे स्थान पर है, सिर्फ जर्मनी से पीछे, रोज़ाना मीडिया कार्ड पर परिणाम बता रहा है..

सम्भवित अणु टेक मे  इरान, इज़्ररायेल, नोर्थ कोरीया है ... पाकिस्तान का अणुबंब बम्ब से ज्यादा अमेरीकी डीपस्टेट कंट्रोल्ड अमेरीकी छीपा हुआ अणु टेक है... ये अणु ताकत पर उसका स्वतंत्र अधिकार ही नहि है..... और मझा तो लो के सब पाक के ज़ूठ का बढावा करते है... अपनी चालाकी छुपानेकी दोहरी निती से...जिसे ओपरेशन सिंदुर ने बहोत ही बडे शंकाओमे सबको कर दिया है.... 

2 चीन: .... 1....2...2A   2 बी कौन... क्यो की ये हेराक्रीरी इम्पोर्टंट है....

1 या 2 रूस USA संतुलन अमेरिका की ओर शिफ्ट हो गया 

क्योंकि रूसने यूक्रेन के साथ लंबे युद्ध में अपनी कमजोरी उजागर कर दी।

चीन के लिए स्थायित्व एक मुद्दा है, और टिकाउ सामान दे नहि शकते... अब शस्त्रोमे भी कमीया दिखाइ दी....और अभी भी इसमें महारत हासिल करनी है। तो....कोई उन्हें रैंक देता है; ये शीर्ष पर हैं ये दोनो कम्युनिस्ट कंट्री है.. वहा का मिडीया और हर चीज़ पे सरकार की निगरानी और गुप्तता और कोइ विरोध सीधा जैल या कमोत देश निकाल वो भी चाइना  के ही बरफीली डेज़र्ट मे या जेल मे... आज तक बहोत कम लोग ने नाकामियाब चाइनीज़ को आरामसे देखा है... भरी पार्लामेंट मे एक बडे टॉप लिडरको एक कैदी जैसा मारते हुए दिखाया गया... ये क्या था वोर्नींग अपनेही लोगो को....  इसका ये हाल हो शकता है तो विरोध के सूर सोचने वालो ... देखलो हम ये करेंगे....

अमेरिका नंबर 1 है। चाहे यूके फ्रांस या यूरोपीय संघ इसे पसंद करे या नहीं...... अतिरिक्त फायदा

अंतर ही बहोत दूर है... अलग कोंटीनेंट ...

दूसरों से बहुत आगे। प्राकृतिक संसाधन। विज्ञान, टेक्नोलॉजी, सैन्य शक्ति, अंतरिक्ष हथियार, कई अपरंपरागत हथियार, सेना। पूरी दुनिया में स्थित। वर्ग किलोमीटर के हिसाब से पूरी दुनिया की निगरानी। आर्थिक शक्तियां। विश्व बैंक UNO वीटो शक्ति प्राप्त। पार्टनर के साथ काम करने की क्षमता दोस्ती के लिहाज़ से खतरनाक है। देश की हर चीज़ की निगरानी करने की क्षमता.... समय की योजना! अब तक सभी  का कुल प्रभाव सिर्फ प्रगति, अस्तित्व और उन्होंने क्वालिटी और एश्योरेंस की शायद ही कभी परवाह की हो, और अब तक बदनामी की भी... रेवोल्यूशन 

ड्रैकुला ने अब खून चख लिया है... और शिकार पर है! 

                          यह हॉलीवुड की तुलना कहना बहुत कठोर है, लेकिन शर्म खत्म हो गई है। यहां तक ​​कि रियलिटी शो और कोर्ट रूम की शालीनता भी खत्म हो गई है। यही बात सच्चे यूरोपियनों को सबसे ज़्यादा परेशान करती है। वे इतने लापरवाह और पारंपरिक बदलाव करने वाले हैं कि सभी प्रेसीडेंट पर जुते फेंकना, जर्ज पर जुते फेकना सरे आम हो रहा है.... लोग भी चोरो को एप्लोड करते है... ये गंदकी इलेक्शन के दिनो मे बहोत ही घीनौना प्रदर्शन करती है...  और बडी बात ये है... के कुछ भी कहेने की आजादी के नाम पर ये सब लिबर्टी की सीमा को जोड इसपर अमेरीकी मिडीया यश लेता है.... ये शरम की बात है... जिसे वो लिबर्टी और आजादी जैसे जताते है..

 वे इतने लापरवाह और पारंपरिक बदलाव करने वाले हैं कि हर समय... ट्रंप हमेशा पब्लिक में लाल टोपी पहनते हैं, प्रोटोकॉल की मर्यादाओं को गलत बताते हुए सिग्नल भेजते हैं..उनके लेक्चरमे  किसीभी स्टेट हेडको एकदम गाली जैसा बोल देते है... वो भी जरा सी भी सोच हिच के बिना  ... 

जब पूर्व राष्ट्रपति कार्टर ने जर्सी पहनी थी तो यूरोपीय पत्रकारों ने अतीत में उनकी बहुत आलोचना की थी...

प्रे. बुश को जुता मारा तो ... उन्हो ने कहा की मै ने तो नम्बर भी पढ लिया 8 नम्बर साइज़ का जुता था... एसे कहेके इसका जोक बना दिया ... और कितने विटी है  ये मिडीया रीएक्शन बनवा लिया....

यहा  प्रेक्लिंटनको भी लज्जित करने मे कोइ कसर नहि छोडी... उन के ट्रायल का टेलिकास्ट कर के मिडीया वाले को कमाने दिया....  जो  क्लिंटन के प्ले बोय टाइप बीहेवीयर के आरोप बनिस्बत लेडीस सन्मान भावना और छीछोरेपन की सीमा ए पार कर जाने वाले स्विकार , विक्रुती भरे हुए आरोप थे.  लिबर्टी और कन्सेंट का ज़ांसा दे निपटा लिये.. और प्रजा जराभी परेशान न रही... ये मिडीयाने जरुर जताया के देखो कितना फ्रीडम है... देश का पहेला नम्बर के व्यकती परभी कानून है और वो जिम्मेदार है ..जवाब्दारी जताने....इसको तारीफ इस मामले पर तो बनती भी है... के हा... छूट तो है... कानून भी है...कार्यवाही भी है...

जेफ केनेडी के मर्डर वख्त  जेक्वेलीन केनेडी की जांच सबसे जरुरी थी... इस का भी उन्हो ने हौआ पब्लिसिटी बनाइ... और चिफ जस्टीस अमेरीका ने अपनी टीम की और से भरी ओपन कोर्ट मे रोती हुइ डीस्टर्ब महिलाको डीस्टटर्ब नहि कर शक ते... कहे के... सी आइ ए को सब पर्दा गिराने मे , सिस्टम को बचाने का काम किया.. और फर्स्ट लेडी को न पुछ कर सस्पेंस कायम कर दिया....  प्रेस. केनेडी की  जान लेने वाली बुलेट की पूछ्ताछ जो रीपोर्ट पढ कर आप रो पडो गे... इतनी मेजिक बुलेट कोइ हातिमताइ की जादु जैसी त्रेजेक्टरी सफर बताइ ग इ , और प्रेसीडेंट के सस्पेक्ट खूनी को ही किसीने मार दिया..... और जो मेजिक बुलेट की ट्रावेल दिखाइ है..कोइ 3 सरी कक्सा तक पढा लडका भी नहि माने एसी मल्टीपल हिटस और इस्का रेखांकन जग मश्हूर है के 

जतानाभी नहि आता... निभाना भी नहि आता... छुपाना भी नहि आता....  पोलिस को सब छीप जाता है तो ये सब बे इज्जती मंजूर है....   और ये सबसे बडे लोक तंत्र मे हो चूका है...

... सी आइ ए और सिस्टम ओफ अमेरीका सर्वोपरी है.   श्री.. ट्रम्प साहब कोइ एक तानाशाह नहि है... वो सिर्फ मुखौटा है...और वो बडे मझे ले कर गालिया तक , और उट पटांग फतवे जाहिर करते रहेते है.. 

ए भाइ जरा देख के चलो... आगे भी नहि पीछे भी दाये ही नही बाये भी उपरही नहि निचे भी... 

आखिरकार USA उन लोगों से बना है, जो EU UK के इमिग्रेंट्स बडी मात्रा मे हैं!

अफ्रीका से काले रंग आबादी, भारतीयों द्वारा मोटेलियन! धीरे-धीरे, हम देखते हैं कि अच्छी खासी संख्या में भारतीय ज़्यादा सैलरी वाली नौकरियों में हैं! वे "थोड़ा कम सैलरी" लेने के लिए भी तैयार रहते हैं, जिससे अमेरिकियों के लिए ज़्यादा संघर्ष करना स्वाभाविक हो जाता है!

सिर्फ रूस और चीन ही प्राकृतिक ध्रुव चुंबक के रूप में विकसित हुए हैं! जापान, कोरिया और इटली की ज़्यादा नहीं चलती क्योंकि वे गैर-परमाणु और कभी काबू में किए गए देश हैं!

अमेरिका सभी को N लेवल से नीचे रखने की पूरी कोशिश करता है। 

हाल के ऑपरेशन सिंदूर ने पाक की परमाणु शक्ति को बेनकाब कर दिया है क्योंकि यह सिर्फ़ US के कंट्रोल में है! पाक बुरे काम करने के लिए सुरक्षा के लिए इंसानों की सप्लाई कर रहा है! 

अगर (M) लोग, यानी जॉर्डन, यमन, अफगानिस्तान के मुसलमान मारे जाते हैं तो ठीक है?! 

जैसे कि सिर्फ़ यहूदियों और भारत के साथ समस्या हो?! 

पाक सेना के जर्नल मेडल ऑफ ग्लोरी दिखाते हैं! 

उन्हें यूरोप और कतर, तुर्की, सऊदी, UAE जैसे देशों का सपोर्ट मिलता है

 (इससे हमारे PM का UAE प्रमुख को गले लगाना, जो स्वाभाविक हो सकता था, लेकिन भारतीय मीडिया ने भी इस पर ध्यान दिया! तो हम मैच्योरिटी के संकेत दिखा रहे हैं,😀) 

यही प्रेम प्रतीक तुरंत इनाम भी लाया.... आजकल में UAE से 900 छोटे-मोटे गुनाह, बॉर्डर लाइन गुनाह वाले रिहा किए गए.... सब भारतीय..... यह इसलिए ज़रूरी है क्योंकि वहाँ सज़ा बहुत कड़ी होती है... और इन सभी लोगों को धंधा बदलकर ईमानदारी बरतने की वॉर्निंग, बॉन्ड भी लिया गया है....

पाक को US और UAE, SA और दूसरे मुस्लिम देशों से भीख मिलती है!

अफगानिस्तान, जॉर्डन और मिस्र के लिए, उन्होंने अपने ही धर्म के काफी लोगों को मार डाला है। मरवाये वो भी पाक के हाथो... उनका रुख और काम संदिग्ध, लालची और कमर्शियल हैं। 

EU की मुख्य महाशक्ति की असली भावना अमेरिका के साथ है, 

बड़ा भाई होने से किसी को नुकसान नहीं हुआ है,

 लेकिन अमेरिका ने उन्हें पूरी तरह से काबू कर लिया है ताकि कोई विरोध शक्ति न रहे।

राष्ट्रपति श्री ट्रम्प हमेशा दोनों तरफ से तबला बजाते हैं। 

उनका मानना ​​है कि बातचीत से पहले दिखावा करने से पार्टी को धमकाने में मदद मिलती है। 

अब हम समझते हैं कि क्यों। 

वह जोकर की भूमिका निभाते हैं और पहल करते हैं। 

असल में वह चाणक्य द्वारा बताए गए विरोधियों से निपटने के सभी साम दाम दंड भेद तरीके अपना रहे हैं...

. दूसरा बहुत बड़ा उदाहरण। वह हैंड इन ग्लव तकनीक का इस्तेमाल करते हैं... और पिछले दरवाजे से लुभाते हैं....

राष्ट्रपति पुतिन से लड़ना और दामाद को रूस भेजना?! 

वहाँ भी, वह कोई पर्यटक नहीं है या परिवार की स्वागत यात्रा पर नहीं है! 

वह रूस में नोडल व्यक्तियों से मिलता है। 

अब कोई कुछ नहीं छिपा रहा है, हालांकि अमेरिका इसे पारिवारिक यात्रा बता रहा है!

जो भी हो, हाल ही में वे दावोस में या EU की बैठकों में चिल्ला रहे हैं, 

क्या वे अमेरिका से लड़ने के लिए हथियार ले जा रहे हैं?! 

वह भी दिखावटी तौर पर ग्रीनलैंड के लिए अमेरिका के संभावित आक्रामक इरादे से बचाव के लिए....

 भारतीय इन सबका आनंद ले रहे हैं। यह बदला लेने का समय है। हमारे खुजली वाले पत्रकार उन्हें वैसे ही कवर कर रहे हैं जैसे उन्होंने हमें काफी ज़लिल  किया था!!!!!?!?!

 मज़ेदार बात यह है कि, हाल ही में अमेरिकी कंपनियों से हमलावर ड्रोन, महंगे हथियार खरीदने के बाद...

 डेनमार्क ने अमेरिका द्वारा संभावित हमले से बचाव के लिए कहा, हमने ये भारी तोपें खरीदी हैं....

 इसे कौन मानेगा... अमेरिका से लड़ने के लिए, आप सीधे अमेरिकी कंपनी से खरीदते हैं??? 

आपकी ढीली बात करने की रणनीति कितनी सही है? 

ग्रीनलैंडके कई लोग अमेरिकाको स्वीकार करने तैयार हैं जो गलत है, कोइ है ही नहि !एसी प्रदर्शनी रोज इयु करेगा

क्योंकि वे केवल अमेरिकियों के बीच समानता के लिए लड़ रहे हैं... ग्रीनलैंड, हालांकि अब समृद्ध है... लेकिन 

अमेरिकी नागरिक मिलना  कुछभी बुरा नहीं है.... ग्रींन लेंड क्या चाहता है...ये इयु किसी भी तरहा पब्लिक वोट नहि करने देगा....  वो अब  भारत को वोटिंग करानेको कैसे कहे  शकते है...हमभी अभी इसी मोके पे चोका मारने उन्हे सुझाव दे कर ताना तानी कर शकते है के पब्लिक वोट जो सिर्फ 56000 है आराम से कर शकते है... मगर डरते है दोनो... कि फैसला अपेक्सित नहि हुआ तो... जैसे हम भी हमारे देश प्रदेश मे पी ओ के वापिस करो ..मे वोटिंग को गिनने तैयार ही नहि... इस से अच्छा है जै से है   रहे...

फिर से बनाने में... ग्रीनलैंड का शासक चिंतित है... क्योंकि पैसा, सुरक्षा, अमेरिका द्वारा लुभाना अगर किया गया तो सहमति खरीद सकता है। इसलिए, किसी राष्ट्र को बचाने के नाम पर कोई विशेष, गंभीर सर्वेक्षण की अनुमति नहीं है, यह एक मजबूरी है! 

जैसे किराएदार खरीदने को तैयार है और मालिक बेचने को तैयार है, असली समस्या सिर्फ़ कीमत है...

 EU देशों का डर भी बहुत ज़्यादा है, हम सबने देखा है कि उन्होंने कितनी आसानी से और बेरहमी से वेनेजुएला में दखल दिया है.... और देखो वह नोबेल प्राइज़ का मज़ा...

 प्राइज़ के लिए डोनाल्ड ट्रंप को पीछे छोड़ने वाली विनर उनसे मिलने वापस जाती है और खुद को चुनाव लड़ने 

और वेनेजुएला जीतने की इजाज़त देने का रास्ता बनाती है और जाने वाली सरकार के खिलाफ विद्रोह में सहयोग

 करने को तैयार है.! सत्ता के लिये कुछ भी.... तो मदुरो सच्चा था क्या ?... हमे शक होने लगा उस लेडी पर तो क्या ?

क्या यह राष्ट्रपति ट्रंप का मास्टर स्ट्रोक नहीं है? 

आम जनता के लिए नोबेल प्राइज़ का महत्व और ट्रंप को न देकर हासिल की गई न्यूट्रैलिटी, क्या यह उल्टा नहीं है? 

ट्रॉफी पकड़ने और उसे रखने का गर्व। विजेता ने खुद इसे दिया, और वे दोनों एक ही फोटो में 

हम किसीका पक्ष नहीं लेते। दोनों सही हैं और दोनों पक्ष गलत भी हैं... लोगों के हित में, उन्हें शांति से ऐसा करना चाहिए.... 

चिल्लाना... मार्च निकालना... मिलिट्री एक्सरसाइज करना, और वे तकनीकें वाघा बॉर्डर परेड डिस्प्ले जैसी हैं, जहाँ ज़नून और ताकतें दिखाई जाती हैं, लेकिन सिर्फ बातचीत के लिए और बहुत ज़्यादा फिल्मी.....

लेकिन एक भारतीय के तौर पर दर्शक बनकर बहुत मज़ा आता है और UK फ्रांस जर्मनी और दूसरे EU देशों द्वारा

 निभाई गई भूमिका की आलोचना करना, यह देखकर कि मिस्टर ट्रम्प और उनकी मिलिट्री लीग ने यूक्रेन रूस युद्ध

 कैसे लंबा खींचा और व्यावहारिक रूपसे अपनी मिलिट्री क्षमताओंको मापा और शायद उनके पास काउंटरभी हैं....

ग्रीनलैंड की कमआबादी अमेरिकी कॉर्पोरेट दिमाग के लिए संभालने में आसान चीज़ बन जाती है। कुल सिर्फ 56000 लोग और डेनमार्क की पेंशन के लिए आर्थिक निर्भरता USA में निवेश करना US के लिए कवर करने लायक है....डेन्मार्क के शासको ने अमेरीकामे रखे पैसे को वापस ले लिया है... मगर ये अमरीका पहेले से तैयार लगता है क्यु की इसकी उम्मिद की रीएक्शन नहि आइ है... दोनो तरफ के रीपोर्ट आते रहेते है...... 

तो अगर कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति होता तो वह भी ऐसा ही करता! मगर ये थोडा रूड जरुर है..अगर अब तक नहीं किया है, तो अमेरिकन इंटरेस्ट को ज़िंदा रखने के लिए ज़रूर करेगा। ट्रम्प पहल करने के लिए तैयार हैं... 

उनके अनुसार, जो कदम वह उठाते हैं, वे शुरू में भारतीय बाज़ार के लिए हानिकारक हैं, लेकिन असल में यूरोप को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं.क्योंकि वह उन्हें दूर रखना चाहते हैं.... मज़ाक देखिए, वह कहते रहते हैं कि मिस्टर मोदी मेरे बहुत मज़बूत और समझदार दोस्त हैं.... और इसी तरह....जोकर बन करभी अपनी सोच चलाते है  

ग्रीनलैंड में देशभक्ति की भावना फिर से जाग रही है, या लालचु यु एस ए मे जायेंगे  उम्मीद है.लेकिन कोई नहीं जानता कि किस्मत में क्या लिखा है... हो सकता है कोई यूरोपीय रणनीतिक रूप से कोई नया हथियार ढूंढे जो कम से कम US को ऐसा करने से रोक सके। 

फ्रांस और कनाडा हैरान डेनमार्क से ज़्यादा खुलकर बोल रहे हैं। हैरानी की बात है कि USA भी NATO में है!!! यूरोपीय लोगों ने सोचा था कि उनके पास राजनीतिक शतरंज की मास्टरी है। डर बना रहेता है... खुदको विश्वास दिलाने चिल्लाता .. शकमंद वलनेरेबल ज्यादा दिखता है.. मगर इन साम अंकल का कोइ भरोसा नहि... 

वो भाप गया है के नाटो कितने पानीमे है... 1942 के विश्व युद्ध के बाद इस इयु ने युक्रेन को छोड.... कोइ डायरेक्ट लडाइ किसीसे नहि लडी... एक लोक कंट्री समूह कैसे लड शकता है... तो उनका इकठ्था होना समज आता है... मगर सब आलसी हो गये है... लडनेका हूनर पहेले जैसा इस मोडर्न जमाने मे नहि है.... हर चीज़ मे विजय अपेक्सित नहि है...एक अमरीका का सम्पूर्ण बहिश्कार करना ... वो इकोनोमिकल व्यापरिक उपाय लम्बा चलाने है तैयार ?

अमेरीका मे हर बदलाव वेव होता है... 

वो आगे जनरेशनको ले जाएगा या और गीरा देगा उससे कोइ फर्क नही !!!  

आने वाली जनरेशनको जो ठीक लगे सुधारे या बिगाडे वो उनपर है... बस चेंज चाहीए जरासीभी  बरदास्त करनेकी ज़ुक्जाने वाली बात , पीछे पैर लेना न मुमकीन . ये ओवर कोंफीडंसभी गलत है....सही या गलत बदलती हुइ चीज़ है तो वो चुनने की आझादी सदा बुलंद रहेनी चाहिये...       

चोर यदी नइ मोडस ओपरंडीसे कोइ चोरीभी करता है तो लोग उसकी तारीफभी करते है और सरकार उसे कंट्रोल करनेमे नाकाम हुइ उसे एक त्योहार की तरहा मनाते है... आजादी बस आजादी... गुनाह करनेकीभी आज़ादी ? 

 यदि कोइ नया पन होना चाहिये परसनल डीसिप्लिन फेमिलि वेल्यु... जान बूज़ कर या अनजाने मे हुइ भूल ...?  

एसे एस्केप रुट हर जगह मौजुद है सब ..अमेरीकामे सब से ज्यादा... ये एक सुपेरियारीटी कोम्प्लेक्स है ओर सामान्य

 को उकसाता रहेता है... कोम्पिटीटीव रखता है.. रफतार अचछी    चीज़ है पर हर वक्त शांतिको नजर अंदाज़

 करना ठीक भी नहि है.. उसे भी अमेरीकी स्टांडर्ड का सन्मान मिलना चाहीये....

American finds every change is a step forward in progress, whereas Quality Control senses say it's a deterioration from normal. Americans feel that if it is wrong, future generation is free to correct it by wave !!!  So waves are on..

These ads fuel. A normal life for those who are quiet, peace-lovers, disciplined, protocol-oriented

will always be centred around these Negs. Come what may, let us face it.  Dr H G Joshi.

साभार माहिती

-Gaurav Arya,-Ankit Shrivastav, -Aadi Anchit, -Gen. Baxi, O2 IAS Academy, Dixa Sharma

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